Suryakant Tripathi Nirala poems सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की रचनाएँ

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हिन्दी ऑनलाइन जानकारी के मंच पर आप सभी हिन्दी भाषा प्रेमियों का सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की रचनाएँ पढ़ने के लिए स्वागत है। ( Suryakant Tripathi Nirala poems in hindi )

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविताएं हिंदी साहित्य के क्षेत्र में विशेष स्थान रखती हैं। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी हिन्दी साहित्य के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। छायावादी युग के चार प्रमुख हस्ताक्षर जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पन्त, महादेवी वर्मा और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला हैं। महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की रचनाएँ हिन्दी साहित्य में एक अलग ही पहचान रखती हैं। उन्हीं रचनाओं में से कुछ प्रमुख रचनाएं हिन्दी ऑनलाइन जानकारी के मंच पर प्रस्तुत की गई हैं।

आइए पढ़ते हैं सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की रचनाएँ ( Suryakant Tripathi Nirala poems in hindi )

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1) Famous Suryakant Tripathi Nirala poems in hindi सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की रचनाएँ -:

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जागो फिर एक बार – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

जागो फिर एक बार
प्यार जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें
अरुण-पंख तरुण-किरण
खड़ी खोलती है द्वार
जागो फिर एक बार

आँखे अलियों-सी
किस मधु की गलियों में फँसी
बन्द कर पाँखें
पी रही हैं मधु मौन
अथवा सोयी कमल-कोरकों में?
बन्द हो रहा गुंजार
जागो फिर एक बार

अस्ताचल चले रवि
शशि-छवि विभावरी में
चित्रित हुई है देख
यामिनीगन्धा जगी
एकटक चकोर-कोर दर्शन-प्रिय
आशाओं भरी मौन भाषा बहु भावमयी

घेर रहा चन्द्र को चाव से
शिशिर-भार-व्याकुल कुल
खुले फूल झूके हुए
आया कलियों में मधुर
मद-उर-यौवन उभार
जागो फिर एक बार

पिउ-रव पपीहे प्रिय बोल रहे
सेज पर विरह-विदग्धा वधू
याद कर बीती बातें
रातें मन-मिलन की
मूँद रही पलकें चारु
नयन जल ढल गये
लघुतर कर व्यथा-भार
जागो फिर एक बार

सहृदय समीर जैसे
पोछों प्रिय, नयन-नीर
शयन-शिथिल बाहें
भर स्वप्निल आवेश में
आतुर उर वसन-मुक्त कर दो
सब सुप्ति सुखोन्माद हो
छूट-छूट अलस
फैल जाने दो पीठ पर
कल्पना से कोमन
ऋतु-कुटिल प्रसार-कामी केश-गुच्छ

तन-मन थक जायें
मृदु सरभि-सी समीर में
बुद्धि बुद्धि में हो लीन
मन में मन, जी जी में
एक अनुभव बहता रहे
उभय आत्माओं मे
कब से मैं रही पुकार
जागो फिर एक बार

उगे अरुणाचल में रवि
आयी भारती-रति कवि-कण्ठ में
क्षण-क्षण में परिवर्तित
होते रहे प्रृकति-पट
गया दिन, आयी रात
गयी रात, खुला दिन
ऐसे ही संसार के बीते दिन, पक्ष, मास
वर्ष कितने ही हजार
जागो फिर एक बार

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अभी न होगा मेरा अन्त – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

अभी न होगा मेरा अन्त
अभी-अभी ही तो आया है
मेरे वन में मृदुल वसन्त
अभी न होगा मेरा अन्त

हरे-हरे ये पात
डालियाँ, कलियाँ कोमल गात

मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर
फेरूँगा निद्रित कलियों पर
जगा एक प्रत्यूष मनोहर

पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लूँगा मैं
अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं

द्वार दिखा दूँगा फिर उनको
है मेरे वे जहाँ अनन्त
अभी न होगा मेरा अन्त

मेरे जीवन का यह है जब प्रथम चरण
इसमें कहाँ मृत्यु
है जीवन ही जीवन
अभी पड़ा है आगे सारा यौवन
स्वर्ण-किरण कल्लोलों पर बहता रे
बालक-मन

मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बन्धु, दिगन्त
अभी न होगा मेरा अन्त

मातृ वंदना – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

नर जीवन के स्वार्थ सकल
बलि हों तेरे चरणों पर, माँ
मेरे श्रम सिंचित सब फल

जीवन के रथ पर चढ़कर
सदा मृत्यु पथ पर बढ़ कर
महाकाल के खरतर शर सह
सकूँ, मुझे तू कर दृढ़तर

जागे मेरे उर में तेरी
मूर्ति अश्रु जल धौत विमल
दृग जल से पा बल बलि कर दूँ
जननि, जन्म श्रम संचित पल

बाधाएँ आएँ तन पर
देखूँ तुझे नयन मन भर
मुझे देख तू सजल दृगों से
अपलक, उर के शतदल पर
क्लेद युक्त, अपना तन दूंगा
मुक्त करूंगा तुझे अटल
तेरे चरणों पर दे कर बलि
सकल श्रेय श्रम संचित फल

गीत गाने दो मुझे – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

गीत गाने दो मुझे तो
वेदना को रोकने को

चोट खाकर राह चलते
होश के भी होश छूटे
हाथ जो पाथेय थे, ठग
ठाकुरों ने रात लूटे
कंठ रूकता जा रहा है
आ रहा है काल देखो

भर गया है ज़हर से
संसार जैसे हार खाकर
देखते हैं लोग लोगों को
सही परिचय न पाकर
बुझ गई है लौ पृथा की
जल उठो फिर सींचने को

तुम और मैं – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

तुम तुंग – हिमालय – श्रृंग
और मैं चंचल-गति सुर-सरिता

तुम विमल हृदय उच्छवास
और मैं कांत-कामिनी-कविता

तुम प्रेम और मैं शान्ति
तुम सुरा – पान – घन अन्धकार
मैं हूँ मतवाली भ्रान्ति

तुम दिनकर के खर किरण-जाल
मैं सरसिज की मुस्कान
तुम वर्षों के बीते वियोग
मैं हूँ पिछली पहचान

तुम योग और मैं सिद्धि
तुम हो रागानुग के निश्छल तप
मैं शुचिता सरल समृद्धि

तुम मृदु मानस के भाव
और मैं मनोरंजिनी भाषा
तुम नन्दन – वन – घन विटप
और मैं सुख -शीतल-तल शाखा

तुम प्राण और मैं काया
तुम शुद्ध सच्चिदानन्द ब्रह्म
मैं मनोमोहिनी माया।

तुम प्रेममयी के कण्ठहार
मैं वेणी काल-नागिनी
तुम कर-पल्लव-झंकृत सितार
मैं व्याकुल विरह – रागिनी

तुम पथ हो, मैं हूँ रेणु
तुम हो राधा के मनमोहन
मैं उन अधरों की वेणु

तुम पथिक दूर के श्रान्त
और मैं बाट – जोहती आशा
तुम भवसागर दुस्तर
पार जाने की मैं अभिलाषा

तुम नभ हो, मैं नीलिमा
तुम शरत – काल के बाल-इन्दु
मैं हूँ निशीथ – मधुरिमा

तुम गन्ध-कुसुम-कोमल पराग
मैं मृदुगति मलय-समीर
तुम स्वेच्छाचारी मुक्त पुरुष
मैं प्रकृति, प्रेम – जंजीर

तुम शिव हो, मैं हूँ शक्ति
तुम रघुकुल – गौरव रामचन्द्र
मैं सीता अचला भक्ति

तुम आशा के मधुमास
और मैं पिक-कल-कूजन तान
तुम मदन – पंच – शर – हस्त
और मैं हूँ मुग्धा अनजान

तुम अम्बर, मैं दिग्वसना
तुम चित्रकार, घन-पटल-श्याम
मैं तड़ित् तूलिका रचना

तुम रण-ताण्डव-उन्माद नृत्य
मैं मुखर मधुर नूपुर-ध्वनि
तुम नाद – वेद ओंकार – सार
मैं कवि – श्रृंगार शिरोमणि

तुम यश हो, मैं हूँ प्राप्ति
तुम कुन्द – इन्दु – अरविन्द-शुभ्र
तो मैं हूँ निर्मल व्याप्ति

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तोड़ती पत्थर – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

वह तोड़ती पत्थर
देखा मैंने उसे
इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार
श्याम तन, भर बंधा यौवन
नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन
गुरु हथौड़ा हाथ
करती बार-बार प्रहार
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार

चढ़ रही थी धूप
गर्मियों के दिन
दिवा का तमतमाता रूप
उठी झुलसाती हुई लू
रुई ज्यों जलती हुई भू
गर्द चिनगीं छा गई
प्रायः हुई दुपहर
वह तोड़ती पत्थर

देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार
देखकर कोई नहीं
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं
सजा सहज सितार
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार

एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर
ढुलक माथे से गिरे सीकर
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा
मैं तोड़ती पत्थर

सच है – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

यह सच है

तुमने जो दिया दान दान वह
हिन्दी के हित का अभिमान वह
जनता का जन-ताका ज्ञान वह
सच्चा कल्याण वह अथच है
यह सच है

बार बार हार हार मैं गया
खोजा जो हार क्षार में नया
उड़ी धूल, तन सारा भर गया
नहीं फूल, जीवन अविकच है
यह सच है

भेद कुल खुल जाए – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

भेद कुल खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है
देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारी मिल में है

हार होंगे हृदय के खुलकर तभी गाने नये
हाथ में आ जायेगा, वह राज जो महफिल में है

तरस है ये देर से आँखे गड़ी श्रृंगार में
और दिखलाई पड़ेगी जो गुराई तिल में है

पेड़ टूटेंगे, हिलेंगे, जोर से आँधी चली
हाथ मत डालो, हटाओ पैर, बिच्छू बिल में है

ताक पर है नमक मिर्च लोग बिगड़े या बनें
सीख क्या होगी पराई जब पसाई सिल में है

गहन है यह अंधकारा – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

गहन है यह अंधकारा
स्वार्थ के अवगुंठनों से
हुआ है लुंठन हमारा

खड़ी है दीवार जड़ की घेरकर
बोलते है लोग ज्यों मुँह फेरकर
इस गगन में नहीं दिनकर
नही शशधर, नही तारा

कल्पना का ही अपार समुद्र यह
गरजता है घेरकर तनु, रुद्र यह
कुछ नही आता समझ में
कहाँ है श्यामल किनारा

प्रिय मुझे वह चेतना दो देह की
याद जिससे रहे वंचित गेह की
खोजता फिरता न पाता हुआ
मेरा हृदय हारा

भर देते हो – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

भर देते हो
बार-बार, प्रिय, करुणा की किरणों से
क्षुब्ध हृदय को पुलकित कर देते हो

मेरे अन्तर में आते हो, देव, निरन्तर
कर जाते हो व्यथा-भार लघु
बार-बार कर-कंज बढ़ाकर

अंधकार में मेरा रोदन
सिक्त धरा के अंचल को
करता है क्षण-क्षण

कुसुम-कपोलों पर वे लोल शिशिर-कण
तुम किरणों से अश्रु पोंछ लेते हो
नव प्रभात जीवन में भर देते हो

प्राप्ति – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

तुम्हें खोजता था मैं
पा नहीं सका
हवा बन बहीं तुम, जब
मैं थका, रुका

मुझे भर लिया तुमने गोद में
कितने चुम्बन दिये
मेरे मानव-मनोविनोद में
नैसर्गिकता लिये

सूखे श्रम-सीकर वे
छबि के निर्झर झरे नयनों से
शक्त शिरा‌एँ हु‌ईं रक्त-वाह ले
मिलीं – तुम मिलीं, अन्तर कह उठा
जब थका, रुका

प्रगल्भ प्रेम – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

आज नहीं है मुझे और कुछ चाह
अर्धविकव इस हॄदय-कमल में आ तू
प्रिये, छोड़ कर बन्धनमय छ्न्दों की छोटी राह
गजगामिनि, वह पथ तेरा संकीर्ण
कण्टकाकीर्ण
कैसे होगी उससे पार
काँटों में अंचल के तेरे तार निकल जायेंगे
और उलझ जायेगा तेरा हार
मैंने अभी अभी पहनाया
किन्तु नज़र भर देख न पाया
कैसा सुन्दर आया

मेरे जीवन की तू प्रिये, साधना
प्रस्तरमय जग में निर्झर बन
उतरी रसाराधना

मेरे कुंज-कुटीर-द्वार पर आ तू
धीरे धीरे कोमल चरण बढ़ा कर
ज्योत्स्नाकुल सुमनों की सुरा पिला तू
प्याला शुभ्र करों का रख अधरो पर

बहे हृदय में मेरे, प्रिय, नूतन आनन्द प्रवाह
सकल चेतना मेरी होये लुप्त
और जग जाये पहली चाह

लखूँ तुझे ही चकित चतुर्दिक
अपनापन मैं भूलूँ
पड़ा पालने पर मैं सुख से लता-अंक के झूलूँ
केवल अन्तस्तल में मेरे
सुख की स्मृति की अनुपम
धारा एक बहेगी
मुझे देखती तू कितनी अस्फुट बातें मन-ही-मन
सोचेगी, न कहेगी

एक लहर आ मेरे उर में मधुर कराघातों से
देगी खोल हृदय का तेरा चिरपरिचित वह द्वार
कोमल चरण बढ़ा अपने सिंहासन पर बैठेगी
फिर अपनी उर की वीणा के उतरे ढीले तार
कोमल-कली उँगुलियों से कर सज्जित
प्रिये, बजायेगी, होंगी सुरललनाएँ भी लज्जित

इमन-रागिनी की वह मधुर तरंग
मीठी थपकी मार करेगी मेरी निद्रा भंग
जागूँगा जब, सम में समा जायगी तेरी तान
व्याकुल होंगे प्राण
सुप्त स्वरों के छाये सन्नाटे में
गूँजेगा यह भाव
मौन छोड़ता हुआ हृदय पर विरह-व्यथित प्रभाव
क्या जाने वह कैसी थी आनन्द-सुरा
अधरों तक आकर
बिना मिटाये प्यास गई
जो सूख जलाकर अन्तर

भिक्षुक – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

वह आता
दो टूक कलेजे को करता, पछताता
पथ पर आता

पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक
चल रहा लकुटिया टेक
मुट्ठी भर दाने को भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता

साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाए
बाएँ से वे मलते हुए पेट को चलते
और दाहिना दया दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाए
भूख से सूख ओठ जब जाते
दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते
घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते

चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए

ठहरो अहो मेरे हृदय में है अमृत, मैं सींच दूँगा
अभिमन्यु जैसे हो सकोगे तुम
तुम्हारे दुख मैं अपने हृदय में खींच लूँगा

वर दे वीणावादिनी वर दे – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

वर दे, वीणावादिनि वर दे
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
भारत में भर दे

काट अंध-उर के बंधन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे

नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव स्वर दे

वर दे, वीणावादिनि वर दे

तुम हमारे हो – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

नहीं मालूम क्यों यहाँ आया
ठोकरें खाते हु‌ए दिन बीते
उठा तो पर न सँभलने पाया
गिरा व रह गया आँसू पीते

ताब बेताब हु‌ई हठ भी हटी
नाम अभिमान का भी छोड़ दिया
देखा तो थी माया की डोर कटी
सुना वह कहते हैं, हाँ खूब किया

पर अहो पास छोड़ आते ही
वह सब भूत फिर सवार हु‌ए
मुझे गफलत में ज़रा पाते ही
फिर वही पहले के से वार हु‌ए

एक भी हाथ सँभाला न गया
और कमज़ोरों का बस क्या है
कहा – निर्दय, कहाँ है तेरी दया
मुझे दुख देने में जस क्या है

रात को सोते यह सपना देखा
कि वह कहते हैं तुम हमारे हो
भला अब तो मुझे अपना देखा
कौन कहता है कि तुम हारे हो।

अब अगर को‌ई भी सताये तुम्हें
तो मेरी याद वहीं कर लेना
नज़र क्यों काल ही न आये तुम्हें
प्रेम के भाव तुरंत भर लेना

प्रेम के प्रति – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

चिर-समाधि में अचिर-प्रकृति जब
तुम अनादि तब केवल तम
अपने ही सुख-इंगित से फिर
हुए तरंगित सृष्टि विषम
तत्वों में त्वक बदल बदल कर
वारि, वाष्प ज्यों, फिर बादल
विद्युत की माया उर में, तुम
उतरे जग में मिथ्या-फल

वसन वासनाओं के रँग-रँग
पहन सृष्टि ने ललचाया
बाँध बाहुओं में रूपों ने
समझा-अब पाया-पाया
किन्तु हाय, वह हुई लीन जब
क्षीण बुद्धि-भ्रम में काया
समझे दोनों, था न कभी वह
प्रेम, प्रेम की थी छाया

प्रेम, सदा ही तुम असूत्र हो
उर-उर के हीरों के हार
गूँथे हुए प्राणियों को भी
गुँथे न कभी, सदा ही सार

जब कड़ी मारें पड़ीं – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

जब कड़ी मारें पड़ीं, दिल हिल गया
पर न कर चूँ भी, कभी पाया यहाँ
मुक्ति की तब युक्ति से मिल खिल गया
भाव, जिसका चाव है छाया यहाँ

खेत में पड़ भाव की जड़ गड़ गयी
धीर ने दुख-नीर से सींचा सदा
सफलता की थी लता आशामयी
झूलते थे फूल-भावी सम्पदा

दीन का तो हीन ही यह वक्त है
रंग करता भंग जो सुख-संग का
भेद कर छेद पाता रक्त है
राज के सुख-साज-सौरभ-अंग का

काल की ही चाल से मुरझा गये
फूल, हूले शूल जो दुख मूल में
एक ही फल, किन्तु हम बल पा गये
प्राण है वह, त्राण सिन्धु अकूल में

मिष्ट है, पर इष्ट उनका है नहीं
शिष्ट पर न अभीष्ट जिनका नेक है
स्वाद का अपवाद कर भरते मही
पर सरस वह नीति – रस का एक है

मौन – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

बैठ लें कुछ देर
आओ,एक पथ के पथिक-से
प्रिय, अंत और अनन्त के
तम-गहन-जीवन घेर

मौन मधु हो जाए
भाषा मूकता की आड़ में
मन सरलता की बाढ़ में
जल-बिन्दु सा बह जाए

सरल अति स्वच्छ्न्द
जीवन, प्रात के लघुपात से
उत्थान-पतनाघात से
रह जाए चुप,निर्द्वन्द

दीन – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

सह जाते हो
उत्पीड़न की क्रीड़ा सदा निरंकुश नग्न
हृदय तुम्हारा दुबला होता नग्न
अन्तिम आशा के कानों में
स्पन्दित हम – सबके प्राणों में

अपने उर की तप्त व्यथाएँ
क्षीण कण्ठ की करुण कथाएँ
कह जाते हो
और जगत की ओर ताककर
दुःख हृदय का क्षोभ त्यागकर
सह जाते हो

कह जाते हो
यहाँ कभी मत आना
उत्पीड़न का राज्य दुःख ही दुःख
यहाँ है सदा उठाना

क्रूर यहाँ पर कहलाता है शूर
और हृदय का शूर सदा ही दुर्बल क्रूर
स्वार्थ सदा ही रहता परार्थ से दूर
यहाँ परार्थ वही, जो रहे
स्वार्थ से हो भरपूर
जगतकी निद्रा, है जागरण
और जागरण जगत का – इस संसृति का

अन्त – विराम – मरण
अविराम घात – आघात
आह – उत्पात
यही जगजीवन के दिन-रात
यही मेरा, इनका, उनका, सबका स्पन्दन
हास्य से मिला हुआ क्रन्दन

यही मेरा, इनका, उनका, सबका जीवन
दिवस का किरणोज्ज्वल उत्थान
रात्रि की सुप्ति, पतन
दिवस की कर्म – कुटिल तम – भ्रान्ति
रात्रि का मोह, स्वप्न भी भ्रान्ति
सदा अशान्ति

मरण-दृश्य – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

कहा जो न, कहो
नित्य – नूतन, प्राण, अपने
गान रच-रच दो

विश्व सीमाहीन
बाँधती जातीं मुझे कर कर
व्यथा से दीन
कह रही हो – दुःख की विधि
यह तुम्हें ला दी नई निधि
विहग के वे पंख बदले
किया जल का मीन
मुक्त अम्बर गया, अब हो
जलधि-जीवन को

सकल साभिप्राय
समझ पाया था नहीं मैं
थी तभी यह हाय

दिये थे जो स्नेह-चुम्बन
आज प्याले गरल के घन
कह रही हो हँस – पियो, प्रिय
पियो, प्रिय, निरुपाय
मुक्ति हूँ मैं, मृत्यु में
आई हुई, न डरो

तुम्हें चाहता वह भी सुन्दर – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

तुम्हें चाहता वह भी सुन्दर
जो द्वार-द्वार फिर कर
भीख माँगता कर फैला कर
भूख अगर रोटी की ही मिटी
भूख की जमीन न चौरस पिटी
और चाहता है वह कौर उठाना कोई
देखो, उसमें उसकी इच्छा कैसे रोई

द्वार-द्वार फिर कर
भीख माँगता कर फैला कर
तुम्हें चाहता वह भी सुन्दर
देश का, समाज का
कर्णधार हो किसी जहाज का
पार करे कैसा भी सागर
फिर भी रहता है चलना उसे
फिर भी रहता है पीछे डर

चाहता वहाँ जाना वह भी
नहीं चलाना जहाँ जहाज, नहीं सागर
नहीं डूबने का भी जहाँ डर
तुम्हें चाहता है वह, सुन्दर
जो द्वार-द्वार फिर कर
भीख माँगता कर फैला कर

स्वप्न-स्मृति – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

आँख लगी थी पल-भर
देखा, नेत्र छलछलाए दो
आए आगे किसी अजाने दूर देश से चलकर
मौन भाषा थी उनकी, किन्तु व्यक्त था भाव
एक अव्यक्त प्रभाव
छोड़ते थे करुणा का अन्तस्थल में क्षीण
सुकुमार लता के वाताहत मृदु छिन्न पुष्प से दीन

भीतर नग्न रूप था घोर दमन का
बाहर अचल धैर्य था उनके उस दुखमय जीवन का
भीतर ज्वाला धधक रही थी सिन्धु अनल की
बाहर थीं दो बूँदें- पर थीं शांत भाव में निश्चल
विकल जलधि के जर्जर मर्मस्थल की

भाव में कहते थे वे नेत्र निमेष-विहीन
अन्तिम श्वास छोड़ते जैसे थोड़े जल में मीन
हम अब न रहेंगे यहाँ, आह संसार
मृगतृष्णा से व्यर्थ भटकना, केवल हाहाकार
तुम्हारा एकमात्र आधार
हमें दु:ख से मुक्ति मिलेगी- हम इतने दुर्बल हैं
तुम कर दो एक प्रहार

प्रेयसी – Famous Suryakant Tripathi Nirala poems

घेर अंग-अंग को
लहरी तरंग वह प्रथम तारुण्य की
ज्योतिर्मयि-लता-सी हुई मैं तत्काल
घेर निज तरु-तन

खिले नव पुष्प जग प्रथम सुगन्ध के
प्रथम वसन्त में गुच्छ-गुच्छ
दृगों को रँग गयी प्रथम प्रणय-रश्मि
चूर्ण हो विच्छुरित
विश्व-ऐश्वर्य को स्फुरित करती रही
बहु रंग-भाव भर
शिशिर ज्यों पत्र पर कनक-प्रभात के
किरण-सम्पात से

दर्शन-समुत्सुक युवाकुल पतंग ज्यों
विचरते मञ्जु-मुख
गुञ्ज-मृदु अलि-पुञ्ज
मुखर उर मौन वा स्तुति-गीत में हरे

प्रस्रवण झरते आनन्द के चतुर्दिक
भरते अन्तर पुलकराशि से बार-बार
चक्राकार कलरव-तरंगों के मध्य में
उठी हुई उर्वशी-सी
कम्पित प्रतनु-भार
विस्तृत दिगन्त के पार प्रिय बद्ध-दृष्टि
निश्चल अरूप में

हुआ रूप-दर्शन
जब कृतविद्य तुम मिले
विद्या को दृगों से
मिला लावण्य ज्यों मूर्ति को मोहकर
शेफालिका को शुभ हीरक-सुमन-हार
श्रृंगार
शुचिदृष्टि मूक रस-सृष्टि को

याद है, उषाकाल
प्रथम-किरण-कम्प प्राची के दृगों में
प्रथम पुलक फुल्ल चुम्बित वसन्त की
मञ्जरित लता पर
प्रथम विहग-बालिकाओं का मुखर स्वर
प्रणय-मिलन-गान
प्रथम विकच कलि वृन्त पर नग्न-तनु
प्राथमिक पवन के स्पर्श से काँपती

करती विहार
उपवन में मैं, छिन्न-हार
मुक्ता-सी निःसंग
बहु रूप-रंग वे देखती, सोचती
मिले तुम एकाएक
देख मैं रुक गयी
चल पद हुए अचल
आप ही अपल दृष्टि
फैला समाष्टि में खिंच स्तब्ध मन हुआ

दिये नहीं प्राण जो इच्छा से दूसरे को
इच्छा से प्राण वे दूसरे के हो गये
दूर थी
खिंचकर समीप ज्यों मैं हुई
अपनी ही दृष्टि में
जो था समीप विश्व
दूर दूरतर दिखा

मिली ज्योति छबि से तुम्हारी
ज्योति-छबि मेरी
नीलिमा ज्यों शून्य से
बँधकर मैं रह गयी
डूब गये प्राणों में
पल्लव-लता-भार
वन-पुष्प-तरु-हार
कूजन-मधुर चल विश्व के दृश्य सब
सुन्दर गगन के भी रूप दर्शन सकल
सूर्य-हीरकधरा प्रकृति नीलाम्बरा
सन्देशवाहक बलाहक विदेश के
प्रणय के प्रलय में सीमा सब खो गयी

बँधी हुई तुमसे ही
देखने लगी मैं फिर
फिर प्रथम पृथ्वी को
भाव बदला हुआ
पहले ही घन-घटा वर्षण बनी हुई
कैसा निरञ्जन यह अञ्जन आ लग गया

देखती हुई सहज
हो गयी मैं जड़ीभूत
जगा देहज्ञान
फिर याद गेह की हुई
लज्जित
उठे चरण दूसरी ओर को
विमुख अपने से हुई

चली चुपचाप
मूक सन्ताप हृदय में
पृथुल प्रणय-भार
देखते निमेशहीन नयनों से तुम मुझे
रखने को चिरकाल बाँधकर दृष्टि से
अपना ही नारी रूप, अपनाने के लिए
मर्त्य में स्वर्गसुख पाने के अर्थ, प्रिय
पीने को अमृत अंगों से झरता हुआ
कैसी निरलस दृष्टि

सजल शिशिर-धौत पुष्प ज्यों प्रात में
देखता है एकटक किरण-कुमारी को
पृथ्वी का प्यार, सर्वस्व उपहार देता
नभ की निरुपमा को
पलकों पर रख नयन
करता प्रणयन, शब्द
भावों में विश्रृंखल बहता हुआ भी स्थिर
देकर न दिया ध्यान मैंने उस गीत पर
कुल मान-ग्रन्थि में बँधकर चली गयी
जीते संस्कार वे बद्ध संसार के
उनकी ही मैं हुई

समझ नहीं सकी, हाय
बँधा सत्य अञ्चल से
खुलकर कहाँ गिरा
बीता कुछ काल
देह-ज्वाला बढ़ने लगी
नन्दन निकुञ्ज की रति को ज्यों मिला मरु
उतरकर पर्वत से निर्झरी भूमि पर
पंकिल हुई, सलिल-देह कलुषित हुआ
करुणा को अनिमेष दृष्टि मेरी खुली
किन्तु अरुणार्क, प्रिय, झुलसाते ही रहे
भर नहीं सके प्राण रूप-विन्दु-दान से
तब तुम लघुपद-विहार
अनिल ज्यों बार-बार

वक्ष के सजे तार झंकृत करने लगे
साँसों से, भावों से, चिन्ता से कर प्रवेश
अपने उस गीत पर
सुखद मनोहर उस तान का माया में
लहरों में हृदय की
भूल-सी मैं गयी
संसृति के दुःख-घात
श्लथ-गात, तुममें ज्यों
रही मैं बद्ध हो

किन्तु हाय
रूढ़ि, धर्म के विचार
कुल, मान, शील, ज्ञान
उच्च प्राचीर ज्यों घेरे जो थे मुझे
घेर लेते बार-बार
जब मैं संसार में रखती थी पदमात्र
छोड़ कल्प-निस्सीम पवन-विहार मुक्त
दोनों हम भिन्न-वर्ण
भिन्न-जाति, भिन्न-रूप
भिन्न-धर्मभाव, पर
केवल अपनाव से, प्राणों से एक थे

किन्तु दिन रात का
जल और पृथ्वी का
भिन्न सौन्दर्य से बन्धन स्वर्गीय है
समझे यह नहीं लोग
व्यर्थ अभिमान के
अन्धकार था हृदय
अपने ही भार से झुका हुआ, विपर्यस्त
गृह-जन थे कर्म पर
मधुर प्रात ज्यों द्वार पर आये तुम
नीड़-सुख छोड़कर मुझे मुक्त उड़ने को संग
किया आह्वान मुझे व्यंग के शब्द में

आयी मैं द्वार पर सुन प्रिय कण्ठ-स्वर
अश्रुत जो बजता रहा था झंकार भर
जीवन की वीणा में
सुनती थी मैं जिसे
पहचाना मैंने, हाथ बढ़ाकर तुमने गहा
चल दी मैं मुक्त, साथ
एक बार की ऋणी
उद्धार के लिए
शत बार शोध की उर में प्रतिज्ञा की

पूर्ण मैं कर चुकी
गर्वित, गरीयसी अपने में आज मैं
रूप के द्वार पर
मोह की माधुरी
कितने ही बार पी मूर्च्छित हुए हो, प्रिय
जागती मैं रही
गह बाँह, बाँह में भरकर सँभाला तुम्हें

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