Important GK facts about Money in hindi

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GK facts about Money

मुद्रा और मुद्रा से जुड़ी हुई जानकारी ( GK facts about Money in hindi )

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मुद्रा ( Money ) -:


कोई भी ऐसी वस्तु जो जनता की आम सहमति के द्वारा लेन – देन या भुगतान के माध्यम के रूप में प्रयोग की जाती है। अर्थात् जिसका उपयोग विनिमय ( Exchange ) के रूप में किया जाता है। वह मुद्रा ( Money ) कहलाती है।

विनिमय मानव जीवन में प्रमुख रूप से महत्त्वपूर्ण है। एक व्यक्ति उन सभी वस्तुओं और सेवाओं को स्वयं उत्पादित नहीं कर सकता है। जिसकी उसे अपने जीवन यापन के लिए आवश्यकता होती है। अपनी आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए एक व्यक्ति कई अन्य व्यक्तियों पर निर्भर रहता है। इसी निर्भरता का अर्थ विनिमय से है।

और मुद्रा वह वस्तु है जो विनिमय के माध्यम के रूप में सामान्य तौर पर स्वीकार की जाती है। लेकिन जनता के द्वारा कोई भी वस्तु या सेवाओं की अभिव्यक्ति मुद्रा के रूप में की जा सकती है। इसका अर्थ है कि मुद्रा केवल वह नहीं होती है जिसका निर्गमन किसी केंद्र सरकार या केन्द्रीय बैंक द्वारा किया जाता है।

प्राचीन काल में भी लोगों के द्वारा विनिमय के लिए वस्तु विनिमय प्रणाली का उपयोग किया जाता था। परंतु इस प्रणाली की अपनी निम्नलिखित सीमाएं थी।

  1. आदान प्रदान की जाने वाली वस्तुओं का मूल्य एक समान नहीं होता था।
  2. क्रय विक्रय वाले दोनों पक्षों के बीच संबंधित वस्तुओं की आवश्यकता एक समान नहीं होती थी।
  3. वस्तुओं का संग्रह करने और उनका स्थानांतरण करने की समस्या होती थी।
  4. विनिमय में शामिल वस्तुओं का विभाज्य सही तरीके से नहीं हो पाता था।

अतः मुद्रा को एक उपकरण के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। जिसका विनिमय के माध्यम, मूल्य के संचय, मूल्य के मापदंड और भुगतानों के माप के रूप में प्रयोग किया जाता है।


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मुद्रा की तरलता ( Money Liquidity ) -:

मुद्रा की वह क्षमता जिससे उसे नकद में रूपांतरित किया जा सकता है। उस मुद्रा की तरलता ( Liquidity of Money ) कहते हैं। जितनी अधिक आसानी से नकद में रूपांतरित किया जा सकेगा उतनी ही अधिक मुद्रा की तरलता होगी।

मुद्रा की तरलता के लिए विशेषताएं -:

  1. नकद में रूपांतरण आसानी से होना चाहिए।
  2. रूपांतरण में कम से कम समय लगना चाहिए।
  3. रूपांतरण के मूल्य में कम से कम अंतर होना चाहिए।

उदाहरण के लिए नीचे लिखी हुई वस्तुओं को अधिक तरल से कम तरल की ओर लिखा गया है।
कैश -> चेक बुक -> सोना -> घड़ी -> कार -> फ्लैट

तरलता के आधार पर मुद्रा के प्रकार -: ( Types of Money on the basis of liquidity )

  1. संक्रीण मुद्रा ( Narrow Money ) -:
    मुद्रा आपूर्ति का वह हिस्सा जिसको आसानी से नकद में रूपांतरित किया जा सकता है। जिसकी तरलता सर्वाधिक होती है। संक्रीण मुद्रा कहलाती है। उदाहरण -: कैश ( Cash )
  2. वृहद मुद्रा ( Broad Money ) -:
    मुद्रा आपूर्ति का वह हिस्सा जिसे थोड़े से प्रयास से नकद में रूपांतरित किया जा सकता है। वृहद मुद्रा कहलाती है। उदाहरण -: चेक ( Cheque )
  3. समीप मुद्रा ( Near Money ) -:
    इस प्रकार की मुद्रा की तरलता काफी कम होती है। परंतु कुछ प्रयासों के द्वारा तरल में रूपांतरित किया जा सकता है। समीप मुद्रा कहलाती है। उदाहरण -: शेयर ( Share )
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मुद्रा की आपूर्ति ( Money Supply ) -:

मुद्रा का स्त्रोत ही मुद्रा की आपूर्ति वाला हिस्सा निर्मित करता है। मुद्रा का वह आयतन, जो किसी राष्ट्र की जनता के पास उपलब्ध है तथा जिसका प्रयोग विनिमय या कर के निपटारे में कर सकते हैं। उसे मुद्रा की आपूर्ति के रूप में जाना जाता है। मुद्रा की आपूर्ति के मुख्यतः दो घटक होते हैं।

  1. मुद्रा घटक ( Currency Component ) -:
    मुद्रा का वह हिस्सा जो आम जनता के पास है। ( बैंक में जमा नहीं है ) विकासशील देशों में इस घटक की मात्रा ज्यादा है। यह लगभग 60 – 70 % है। और वहीं विकसित देशों में इस घटक की मात्रा लगभग 15 – 20 % तक है।
  2. बचत घटक ( Deposit Component ) -:
    वह मुद्रा जो वह मुद्रा जो वाणिज्यिक बैंकों के पास तथा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास जमा है। उसे बचत घटक कहते हैं। इस घटक के दो प्रमुख हिस्से होते हैं।
  • क. मांग जमा ( Demand Deposit )
  • ख. सावधि जमा ( Term Deposit )

भारत में मुद्रा की आपूर्ति को मौद्रिक समूह के रूप में अभिव्यक्त किया जाता है। साप्ताहिक आधार पर इसकी गणना की जाती है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के द्वारा इसका सूत्र तैयार किया जाता है।


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मौद्रिक समुच्चय ( Monetary Aggregates ) -:


जब मुद्रा को पूर्ति के रूप में मुद्रित करते हैं। तब हम इसे मौद्रिक समुच्चय कहते हैं। यह निम्नलिखित हैं।

M0 -> इसको मौद्रिक आधार माना जाता है। तथा इसको आरक्षित रकम/ रिजर्व मनी ( Reserve Money ) कहते हैं।

सूत्र -: चलन में मुद्रा + आरबीआई के सम्मुख जमा राशि + आरबीआई के सम्मुख अन्य जमा राशि।

M1 -> इसको संकीर्ण मुद्रा या नैरो मनी ( Narrow Money ) कहते हैं।

सूत्र -: जनता के पास रकम + बैंकिंग तंत्र के पास मांग जमा ( Demand Deposit ) + आरबीआई के सम्मुख अन्य जमा राशि।

M2 ->

सूत्र -: M1 + पोस्ट ऑफिस जमा बैंकों में जमा बचत।

M3 -> इसमें M2 को पुनः परिभाषित किया गया है। इसे ब्रॉड मनी ( Broad Money ) कहा जाता है।

सूत्र -: M1 + बैंकिंग व्यवस्था में समय जमा (Term Deposit )

M4 ->

सूत्र -: M3 + डाक घर जमा बैंक में कुल जमा रकम ( राष्ट्रीय बचत पत्र शामिल नहीं )

तरलता समुच्चय ( Liquidity Aggregates ) -:

जब मुद्रा को तरलता के रूप में मुद्रित करते हैं। तब इसे तरलता समुच्चय कहते हैं।

L1 -> M3 + पोस्ट ऑफिस बचत बैंक के पास कुल जमा राशि ( राष्ट्रीय बचत पत्र/ National Saving certificate को छोड़कर )

L2 -> L1 + ऋण संस्थानों तथा वित्तीय संस्थानों के साथ सावधि जमा + वित्तीय संस्थानों द्वारा प्राप्त किया गया सावधि ऋण + वित्तीय संस्थानों द्वारा जारी जमा प्रमाण पत्र ( Certificate Deposit )।

L3 -> L2 + गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थानों के पास सार्वजनिक जमा राशि।

•• जमा प्रमाण पत्र ( Certificate Deposit ) -:


इसे साधारणतः वाणिज्यिक बैंक द्वारा जारी किया जाता है। इसकी एक निश्चित अवधि होती है। इसलिए यह एक फिक्स्ड डिपॉजिट ( Fixed Deposit ) की तरह ही होता है। परंतु मुख्य अंतर यह है कि जमा प्रमाण पत्र ( Certificate Deposit ) एक पार्टी से दूसरी पार्टी को बेचा जा सकता है। परंतु फिक्स्ड डिपॉजिट के साथ ऐसा नहीं होता है। बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट के आधार पर लोन दे सकती है। परंतु जमा प्रमाण पत्र के आधार पर लोन जारी नहीं कर सकती है।

•• आरक्षित रकम ( Reserve Money ) -:


आरक्षित रकम को उच्च शक्ति प्राप्त मुद्रा ( High Powered Money ) कहते हैं। इसी के आधार पर साख निर्माण होता है। मुद्रा की आपूर्ति मुुख्यतः आरक्षित रकम पर निर्भर करती है। आरक्षित रकम में आरबीआई की ओर से सरकार को दिया गया कुल कर्ज, बैंकों को दिया गया कुल उधार, वाणिज्यिक बैंकों को दिया गया कुल उधार, आरबीआई के पास मौजूद कुल विदेशी मुद्रा, सरकार की जनता के लिए मुद्रा की जवाबदेही, आरबीआई की कुल गैर मौद्रिक जवाबदेही आते हैं।

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मुद्रा के प्रकार ( Types of Money ) -:

1.वस्तु या पदार्थिय मुद्रा ( Commodity Money ) :-

इस प्रकार की मुद्रा में किसी भी पदार्थ का उपयोग मुद्रा के रूप में किया जाता है। उदा. – बर्तन, हाथी दांत।

2. धात्विक मुद्रा ( Metallic Money ) :-

जब किसी भी धातु का उपयोग मुद्रा के रूप में करते हैं तो उसे धात्विक मुद्रा कहा जाता है। उदा. – सोना, चांदी।

3. मानक मुद्रा ( Standard Money ) :-

यह धात्विक मुद्रा का ही प्रकार है। यहां पर अंकित मान का मूल्य उतना ही होता है। जितने मूल्य की वह वस्तु है। उदा. – सिक्के।

4. सांकेतिक मुद्रा ( Token Money ) :-

यहां पर अंकित मान निर्मित मौद्रिक वस्तु के मूल्य से अधिक होता है।

5. कागजी मुद्रा ( Paper Money ) :-

जब कागज का उपयोग भिन्न भिन्न मौद्रिक मान के लिए किया जाता है। भारत में कागजी मुद्रा भारतीय रिजर्व बैंक के द्वारा जारी की जाती है।

अपवाद = भारत में एक रुपए को वित्त मंत्रालय द्वारा जारी किया जाता है। तथा इस पर वित्त सचिव के हस्ताक्षर होते हैं। और सभी प्रकार के सिक्कों को वित्त मंत्रालय जारी करता है व रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया चलन में लेकर आता है।

6. आदेश मुद्रा :-

इसे सरकारी आदेशों के द्वारा जारी किया जाता है। इसके वैधानिक महत्व होते हैं। इस मुद्रा को बगैर सोना, प्रतिभूतियों के आधार पर जारी किया जाता है। इसे संकट की घड़ी में इस्तेमाल किया जाता है। वर्ल्ड वार-2 के समय सबसे ज्यादा आदेश मुद्रा हिटलर ने जारी की थी।

7. बैंक मनी ( Bank Money ) :-

यह वह मुद्रा है जो आम जनता द्वारा बैंकों में जमा की हुई है। इस मुद्रा को मांग के अनुसार भुगतान किया जाता है। इसी जमा राशि के आधार पर चेक, ड्राफ्ट जारी किए जाते हैं। अतः इसे क्रेडिट मुद्रा भी कहते हैं।

8. खाता मुद्रा ( Money of Account ) :-

यह मुद्रा का वह रूप है जिस रूप में सरकार अपने खाते का रख रखाव करती है।

9. वास्तविक मुद्रा ( Real Money ) :-

यह वह मुद्रा है जो वास्तव में किसी देश में चलन में है।

10. वैधानिक मुद्रा ( Legal Tender Money/ Fiat Money ) :-

यह वह मुद्रा है। जिसको सरकार या कानून से समर्थन प्राप्त होता है। प्रत्येक व्यक्ति इस मुद्रा को स्वीकार करने के लिए बाध्य होता है।
इसके दो प्रकार होते हैं –
1. सीमित वैधानिक मुद्रा/ Limited Legal Tender Money ( सिक्के)
2. असीमित वैधानिक मुद्रा/ Unlimited Legal Tender Money ( कागजी नोट )

11. बंजर मुद्रा ( Barren Money ) :-

नगद को बंजर मुद्रा कहते हैं। क्योंकि नकद अपने आप में कुछ भी उत्पन्न नहीं करता है।

मुद्रा की पूर्ति एवं नियंत्रण ( Money Supply and Money control ) -:


भारत में मुख्य रूप से मुद्रा की पूर्ति भारतीय रिजर्व बैंक ( Reserve Bank of India ) करता है। भारत सरकार का वित्त मंत्रालय एक रुपए के नोट और सभी सिक्के जारी करता है। आरबीआई ( RBI ) न्यूनतम मुद्रा कोष प्रणाली ( Minimum Reserve System ) के आधार पर करेंसी ( Currency ) जारी करता है। इस प्रणाली में आरबीआई को न्यूनतम 200 करोड़ का सोना तथा विदेशी प्रतिभूतियां कोष में रखनी होती है। जिसमे से 115 करोड़ का सोना होना अनिवार्य है।

वाणिज्यिक बैंक मांग जमाओं ( Cheque ) के द्वारा मुद्रा का सृजन करते हैं। जो उनके नकद कोष से कई गुना अधिक होती है। वाणिज्यिक बैंकों के द्वारा मांग जमाओं से सृजित मुद्रा बैंक मुद्रा कहलाती है। वाणिज्यिक बैंक स्वयं करेंसी जारी नहीं करते हैं। वे मुद्रा की पूर्ति में ऋण प्रदान करके अपना अंशदान देते हैं।

भारत का केंद्रीय बैंक, जिसे हम भारतीय रिजर्व बैंक के नाम से जानते हैं वो राष्ट्र की मौद्रिक नीति का निर्माण करता है। मौद्रिक नीति के अंतर्गत मुद्रा की आपूर्ति से संबंधित नीतियां निर्मित होती हैं। अगर अर्थव्यवस्था में मौद्रिक आपूर्ति अधिक है तो ऐसी परिस्थिति में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ऐसी नीति निर्धारित करती है। जिससे कि मुद्रा की आपूर्ति में कमी आए। इस कथन का व्युत्क्रम भी सत्य होगा।

भारत सरकार का वित्त मंत्रालय राजकोषीय नीति का निर्धारण करता है। यह वे नीतियां हैं जो सरकार के राजस्व एवं व्यय को निर्धारित करती हैं। अगर लोक व्यय अधिक होता है तो इसका तात्पर्य है कि मुद्रा की आपूर्ति अधिक होगी। जब सरकार मुद्रा की आपूर्ति को रोकना चाहती है तब सरकार अपने व्यय में कमी लाती है। इस कथन का व्युत्क्रम भी सत्य होगा।

इसमें वाणिज्यिक बैंक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब बैंक अधिक लोन निर्गत करता है तो ऐसी परिस्थिति में अर्थव्यवस्था में मुद्रा की आपूर्ति बढ़ जाती है। जब आर्थिक संवृद्धि का दौर आता है तो ऐसे समय में भी बैंकों के द्वारा अधिक से अधिक साख निर्माण होता है। ये सभी मुद्रा की आपूर्ति बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाते हैं। इस कथन का व्युत्क्रम भी सत्य होगा।

घाटे की अर्थव्यवस्था के द्वारा मुद्रा की आपूर्ति में बढ़ोतरी होती है। घाटे की वित्त व्यवस्था, वह व्यवस्था है जहां सरकार को जो घाटा होता है उसकी भरपाई लोन यानि ऋण के द्वारा की जाती है।
जब सरकार अधिक कर लगाती है तब अर्थव्यवस्था में मुद्रा की आपूर्ति में कमी हो जाती है। इसका व्युत्क्रम भी सत्य होगा।

मुद्रा के कार्य ( Use of Money ) -:


यह विनिमय का माध्यम है। वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य का निर्धारण करता है। आंशिक भुगतान के मानक के रूप में कार्य करता है। इसमें धारण की प्रकृति होनी चाहिए। यह तत्काल हुए लेन देन को प्रभावी करता है। यह साख का आधार है। यदि हमारे खाते में मुद्रा होगी तभी हम साख उत्क्रमण ( Credit Reversal ) का प्रयोग कर सकते हैं। मुद्रा के निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण कार्य हैं।

  1. विनिमय का माध्यम -: इसका अर्थ है कि वस्तुओं तथा सेवाओं के क्रय या विक्रय में मुद्रा एक माध्यम का कार्य करती है। अतः मुद्रा की उपस्थिति से विनिमय बहुत सरल और असीमित हो गया है।
  2. मुद्रा का मापदंड -: प्रत्येक वस्तु और सेवा का मूल्य मुद्रा के रूप में मापा जाता है।
  3. स्थगित भुगतान का मान -: स्थगित भुगतान वह होते हैं जिनका भुगतान तत्काल न करके भविष्य में किसी भी समय किया जाता है।
  4. मूल्य का संचय -: इसका अर्थ है कि धन का संचय। इसने निवेश को बढ़ावा दिया।
  5. मूल्य का हस्तांतरण -: मूल्य के हस्तांतरण को सरल बनाने से मुद्रा ने विश्व के सभी भागों में उपभोग तथा निवेश दोनों को प्रोत्साहित किया है।

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उम्मीद है कि आपको ऊपर लिखा मुद्रा और मुद्रा से जुड़ी हुई जानकारी का लेख आपकी परीक्षा की तैयारी में मददगार साबित होगा। Rbi grade b, upsc, all banking exams, SSC CGL etc. Exam ke jaruri vishya Indian economy ki tayiyari ke liye is post ko likha gya hai। Agar kahin koi galti ho to jarur batayen।

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